Goodwill to the family | परिवार की सद्भावना Ladder of success

Goodwill to the family, सफलता की सीढ़ी, Ladder of success, सफलता का मुख्य पड़ाव, परिवार की सद्भावना, सांसारिक रीती-रिवाजों से उसका परिचय.

Goodwill to the family  परिवार की सद्भावना Ladder of success

नमस्कार दोस्तों हमारी इस साईट पर आपका स्वागत है. दोस्तों आज हम आपको हमारी इस पोस्ट के जरिये परिवार की सुख सन्ति का एक सरल उपाय बताने वाले है जिस से आपका परिवार हमेशा सुखी रहेगा, तो चलिए जानते है Goodwill to the family.

परिवार सुसंस्कारिता की पाट्शाला बनें : Goodwill to the family

कहा जाता है की बालक माता-पिता के गुण-सूत्रों के आधर पर विशेषताओं से युक्त होते हैं. यह कथन आंशिक रूप से सही रहा है यह तथ्य आक्ती के रूप में किसी अंश तक सही माना जा सकता है; किन्तु प्र्कुती के स्वभाव के बारे में यह प्रभाव भुत कम अंशों में ही शेस रह जाता है. गभावस्था में प्रवेश करते ही जिव माता के पेत्रुपी आंवे में पकने लगता है.

इस अवधि मन माता की शारीरिक ओर मानशिक स्थिति का भुन पर असाधारन प्रभाव पड़ता है. यदि माता अस्वस्थ, खिन्न, उदिग्न रहेगी तो नै महीने तक बालक पर वैसे ही संस्कार जमते र्हिंगे और जन्मने के उपरांत बचा भी इन्हीं विषमताओ से घिरा रहेगा.

बचा क्या? है इस संबंध में यदि गुण-सूत्रों की घरे तक ण जाया जाए तो मोटे अथो में यही समझा जा सकता है की उसके बिंदु कल्ला से बड़ते-बड़ते संसार के वातावरण में रहकर जीवित रह सकने की स्थिति तक पहुचने में माता का योगदान ही प्रमुख होता है उसी का रस-रक्त बालक के शरीर का गतं करता है इतना ही नहीं; उसका चिन्तन, स्वभाव, दुस्तिकों आदि ही तदनुरूप दलता और बनता है.

Goodwill to the family :

लव-कुश, चक्रवती भरत, शिवाजी, नेपोलियन आदि के व्यक्तित्वों प्रुनकी उनकी माताओं की ही विशेस्ताये सवार रही हैं. पता का पराक्रम तो मकरध्वज, घतोतगज, अस्ताव्क्र, अभिमन्यु आदि में ही दिख पड़ा था. वास्तविकता यह है की माता की शारीरिक या मानसिक स्थिति में प्रसन्नता, दुद्ता येन विशिस्त्ता लाने में पिता का माता के प्रति सदभाव ही प्रधान रूप से काम करता है.

यदि दोनों के बिक मनोमालिन्य, विव्देश रहे तो फिर उन प्रिस्थियों में बालक की स्थिति भी विपन्न बनी रहेगी और जन्मने के उपरांत वह आजाकारी, स्दुगुनी येन अनुशासित न रहेगा. अपनी नज की शारीरिक, मानसिक, स्थिति अची रखने में सफल रहने वाली माताए गुणवती सन्तान को जन्म देती हैं इस काये में, इस विशेष अवसर पर पता को अपनी गतिविधिया एसी रखनी चाहिये की पत्नी पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़ने पाए.

स्नेह और सहयोग प्रदशन से वातावरण अनुकूल बनाये रहने में पता को सामथ्य भर प्रयास करना चाहिए पत्नी की दिन्च्या, विधि-व्यवस्था एसी रहे, जिसमें ण केवल उसका स्वास्थ्य सही रहे, वर्ण मानसिक स्थिति भी विनोद, उत्साह और प्रसन्नता से भरी रहे. संभव हो तो पिता को प्रसव के दिनों में पत्नी का साहस व्दाने एवं डॉ निकालने के लिए अपनी उपस्थिति निकटवरती बनाए रखनी चाहिए उन दिनों की उपचा, विशेषत: प्रतिकूल स्वभाव उत्पन्न करने वाली होती है.

सांसारिक रीती-रिवाजों से उसका परिचय : Goodwill to the family

जन्मने के बाद बालक सवथा अनजान होता है सांसारिक रीती-रिवाजों से उसका परिचय नहीं के बराबर होता है गभ-बधनों औरप्रसव के उपरान्त सवथा अजनबी वातावरण में प्रवेश उसके लिए भय एवं कुतुहल का कारण होता है. इन दिनों वह कोरे कागज दी तरह होता है, जिस पर माताए चाहे जैसा अंकन क्र सकती हैं. पेट में साथ-साथ नो महीने तक उसका स्वाभाविक परिचय माता के शत ही तोता है. मात्र उस अकेली को वह पहचानता है औरअपनी सुरचा एवं सहायता के लिए पूरी तरह उसी पर निर्भर रहता है.

माता का शिशु को पास बुलाना एवं दूध पिलाना प्राय: वैसी ही स्थिति उत्पन्न करता है; जैसी के गर्भावस्था में घनिष्टता और निभैरता थी अतएव इन दिनों में माता को क्स्त्कार्क स्थिति से उबारने में परवार के लोगों को, विशेस्त्या पता को सहयोगी बनकर रहना चाहिए आश्वासनों और सुविधाओं के लिए ठीक यही उपयुक्त समय है. उसे सही रूप में सभाल लेने पर ण केवल प्रसूता अपने खोये हुए स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति क्र लेती है, वर्ण विचित्र परिवर्तन से आस्क्येच्कित नवजात शिशु को आश्वस्त करती है.

Goodwill to the family : परिवार की सद्भावना

अपने देश में अन्भिज्ता के कारण कई विचित्र रिवाज प्रचलित हैं; जैसे-जच्चा को खुली हवा न लेना देना; तेल, घी, मिठाई, मैदा से बने हुए लड्डू खिलाना; प्रसूति के कमरे में भुत-परत भगाने के लिए आग जलती रकना ये सभी प्रचलन आदि से अंत तक गलत हैं किन्तु वुध्दाओं ने जो देखा है; वे उसी अनुभव को सब कुक मानकर प्रसूता को एक प्रकार से हैरान करती हैं यों वे ये सब शुभचिंतक के नाते करती हैं पर उससे होता अनर्थ ही है गंदे वातावरण में गंदे कपड़ों से लपते हुए, डीएम घुटने है से वातावुन में रहने के कारण जच्चा-बच्चा, दोनों ही संकट में फसते हैं. उन्हीं स्वछ हवा और हल्के भोजन की आवश्यकता पडती है.

बच्चे को घटती आदि पिलाते रहना उसके स्वाव्ति को खराब करना है. पालन-पोसन में किन स्तक्र्ताओं की आवश्यकता है; यह समस्त विवरण धात्री पुस्तकों से जाना जा सकता है या किसी सुशिक्षित नर्स से पुछा जा सकता है. दुर्बलों और विमारों की जैसी परिचर्या की जानी चाहिए; उसी से मिलती-जुलती व्यवस्था सघ:प्रसूता येन उसके बालक को भी उपलव्ध होनी चाहिए. इन पंक्तियों में जच्चा-बच्चा प्रसंग के क्रियाकलापों पर प्रकाश नहीं डाला जा रहा है, वर्ण यह खा जा रहा है की आदतों में जो उतार-चदाव आते रहते हैं; उनकी देख-रेख कैसे करनी चाहिए.

परिवार की सद्भावना :

उस शुभारंभ का उपयुक्त मुहूर्त कोंन-सा है. गर्भकाल में बच्चा इतना सक्रिय होता है की मात्र नो महीने की अवधि में अपनी सम्रग संरचना प्रिप्र्ण क्र लेता है. मिनट-मेंट पर वह स्वरूप को बदलता रहता है. इतना ही नहीं, वह माता से शारीरिक पोसन प्राप्त करने के अतिरिक्त उसके स्वभाव और दुस्तिकों को भी अपने में उतारता रहता है.

यह किर्या प्रसव के बाद भी जारी रहती है और जब तक वह माता पर आधारित रहता है; तब तक उसके मन:संस्थान से ही तेजी के साथ प्रभाव ग्रहण करता रहता है.

सफलता का मुख्य पड़ाव : 

देखा गया है की छोटे बच्चे थकन उतारने के लिए अधक समय सोये पड़े रहते हैं, पर उनकी चेतना तब भी कम करती रहती है और किस वातावरण में रहते हैं; उसका भावनात्मक स्वर अप्रत्यक्ष रूप से कसते रहते हैं और अपना स्वभाव विनिर्मित करने में लगे रहते हैं.

अंनगढ़ आदतों में मल-सूत्र का यथासमय और यथास्थान ण क्र पाना, गंदगी और स्व्च्छता का अंतर ण समझ पाना, चिद्चिदाना और जोर-जोर-जोर से देर तक च्ल्लाना, क्रुध्द मुद्रा में हाथ-पैर पीटना हैसी आदतें उनमें प्रकट होंने लगती हैं. यह निषेधात्मक दोर है. जिनके व्यक्तित्व विधेयक स्तर की और चलते रहते हैं. वे जार्गत या प्रसुप्त स्थिति में हस्ते-मुस्कराते हैं.

सफलता की सीढ़ी : Ladder of success

अपनी भूख या मल-त्याग, तंडक, गर्मी, मक्खी-मच्छर आदि को भगाने हेतु के इस प्रकार के अंग-संचालन ध्दारा संकेत करते हैं की मनोयोगपूर्वक. सफलता की पहली शर्त है पूरी तन्मयता, धोर्य और साहस के साथ प्रस्तुत कार्य में जुट जाया जाये दूसरी शर्त है उस कार्य के उपयुक्त अपनी योग्यता, साहस-सामग्री एवं सुयोग्य व्यक्तियों की सहायता वदने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा जाए.

अनुमान लगाने पर उनकी इच्छा का पता चल सकता है; यह तक की उनका कोई अंग-अवयव पीड़ित हो रहा हो, तो साकेतिक भासा समझने का अभ्यास करने पर वस्तुस्थिति का पता चलने लगता है दोनों के बीचा एक बेतार का संपर्क कम करता रहता है और एकदूसरे की मन: स्थिति का परिचय प्राप्त करते रहते हैं. पिता अथवा जो उसे हसने-खिलने में सहयोग दान दे; वह भी उसी परिधि में आने लगता है.

भावनात्मक संकेत फुचाक्र लगभग उसी प्रकार शिक्ष्ण दिया जा सकता है, जिस प्रकार बोलने-समझने वाले बालक को ख-सुनकर अच्छी आदतें अपनाने और बुरी आदतें छोड़ने के लिए प्ररित किया जाता है जिय्मित, अनुशासित और प्रसन्ना रहने की, शान्ति से रहने और रहने देने की आदतें यदि कोई चाहे तो उस यायु में ही सिखा सकता है; जिसमें उसका समुचित बोध्दिक विकास नहीं हुआ होता.

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