Talent recognition : Mira Devi ki Kahani : हुनर से मिली पहचान

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Talent recognition : Mira Devi ki Kahani : हुनर से मिली पहचान

नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है हमारी इस साईट पर दोस्तों आज हम आपको मीरा देवी हुनर की कहानी इस आर्टिकल के माध्यम से बताएंगे जीनोन्हे अपनी मेहनत के बल पर अपने सपने सच कर दिखाए ये कैसे संभव हुआ आइए जानते है Talent recognition.

Talent Recognition :

हुनर हम सब में छिपा होता है बस उसे पहचानने की जरूरत होती है. अकसर लोग आर्थिक निर्भरता को औपचारिक शिक्षा से जोड़कर देखते है लेकिन बिहार के एक छोटेसे गांव की रहने वाली अल्प शिक्षित मीरा देवी अपने मेहनत के बल पर यह सभीत कर दिखाया की अगर हाथो में हुनर और मन में सच्ची लगन हो तो सपने सच भी होते है.

तो चलिए दोस्तों जानते है की किस तरह मीरा देवी ने अपने अंदर के हुनर को पहचानते हुए कड़ी महनत कर के अपने सपने सच कर के दिखाए और किस तरह दुनिया में उनकी पहचान बनी.

मीरा देवी के हुनर की कहानी : Talent recognition

दोस्तों मीरा देवी बचपन से ही पड़ – लिख कर कही नौकरी करना चाहती थी लेकिन आठवीं कक्षा के बाद परिवार वालो ने मीरा देवी का स्कूल बंद कर दिया था क्यू की उनके परिवार का यह मानना था की लड़िया केवल पत्र लिखना सीखजाए तो उनके लिए इतनी ही पढ़ाई काफी है इसलिए चाहकर भी मीरा देवी आगे नहीं पढ़ पाई.

मीरा देवी का जन्म मधुबनी जिले के जंजापुर गांव हुआ था और 1998 में मीरा देवी की शादी होने के बाद वो अपने ससुलाल यानी रैयाम गांव चली गई. जब मीरा देवी की शादी हुई तब उनकी सास उनकी शिक्षिका बनी यानि की मीरा देवी जी को आत्मनिर्भर बनाने में उनकी सास यानि श्रीमती सुदामा देवी का बहुत बड़ा हाथ था. तो चलिए दोस्तों जानते है मीरा देवी को किस प्रकार उनकी सास ने आत्मनिर्भर बनाया.

दोस्तों मीरा देवी के ससुराल में बरसाती मौसम की सुरवात होने के साथ ही नदी किनारे एक खास तरह की घास उग जाती है जिसे सिककी कहा जाता है. जब यह घास सुख जाती है तो उसके बीज को चिर कर धागे की तरह किया जाता है फिर गांव की स्त्रियाँ उस धागे को मनचाहे रंग में रंग कर उस से कई तरह की सजावटी और उपयोगी वस्तु तैयार करती है.

और मीरा देवी जी सास भी इस कला में माहिर थी, जब मीरा देवी ने उस से यह काम सिकने की इच्छा जाहिर की तो उनकी सास उन्हें सिकने को तुरंत तैयार हो गयी घर के काम काज से फुर्सद निकालकर मीरा देवी भी उनके साथ बैठकर यह कला सिकने लगी पहिली बार मीरा देवी ने एक छोटीसी दलिया (हैंडल वाली टोकरी) बनाई थी, जिसे पड़ोस वाली एक स्त्री ने खरीदा था तब मीरा देवी को इस गांव की पारंपारिक कला की जरा भी अंदाजा नहीं था.

मीरा देवी की शुरुआत कैसे हुई : Talent recognition

दोस्तों मीरा देवी के पति की एक छोटीसी दुकान थी इसी दुकान से इन सभी का गुजरा चल रहा था और इन बिच मीरा देवी ने तीन बेटी और एक बेटे को जन्म दे चुकी थी, 2011 में जब मीरा देवी को उनके गांव के एक स्वयंसेवी संस्था के बारे में पता चला तो उस संस्था के साथ मीरा देवी ने जुड़कर काम करने की इच्छा जाहिर की, इस पर लोगो ने यह कहना सुरु कर दिया की परिवार की बहु बहार जाकर कैसे काम करेंगी, लेकिन ऐसे परेशानी में मेरा देवी की सास ने उनका पूरा साथ दिया और उन्ही के प्रोत्साहन से मीरा देवी इस संस्था के साथ मिलकर काम करना सुरु किया.

जब मीरा देवी संस्था के साथ मिलकर काम करने लगी तो इस काम से उनकी अच्छी आमदनी होने लगी साथ ही घर से बहार निकल कर मीरा देवी का आत्मविश्वास आया और हिम्मत बड़ी. पहली बार मीरा देवी किसी वर्कशॉप में काम कर रही थी जिस से उन्हें 5500 मेहताना मिल रहा था जब उन्हे पहिली बार मेहताना मिला तो उन्होने अपना सारा मेहताना अपनी सास को सौप दिया जिस से मीरा देवी जी की सास बहुत खुश हुए और खुश होकर आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया.

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मीरा देवी को मिला आगे बढ़ने का अवसर : Talent recognition

दोस्तों TV पर गणतंत्र दिवस की परेड और झाकी देख कर अकसर मीरा देवी का मन रोमांचिक हो उठता था, मीरा देवी मन ही मन सोचती थी की कैसी होंगी देश की राजधानी दिल्ली और गणतंत्र दिवस की झाकी को करीब से देखना कितना अच्छा लगता होंगा. दोस्तों ये सारी बाते मीरा देवी के लिए एक सपना ही था लेकिन मीरा देवी को यह पता नहीं था की उनका यह सपना बहुत जल्दी सच होने वाला था.

नवंबर 2012 में दिल्ली से कुछ सरकारी अधिकारी मीरा देवी के गांव आए, उन्होंने बताया की उन्हें सिककी घास से कुछ खास सजावटी वस्तुए केवल तीन इंच की साईज में बनवानी है. लेकिन तब बिहार में छढ़ पूजा चल रही थी और गांव की ज्यादातर स्त्रिया प्रसाद बनाने की तैयारी में व्यस्त थी मीरा देवी के साथ मिलकर काम करने के लिए कुछ ही स्त्रिया तैयार हुई, बड़ी मुश्किल से मीरा देवी ने और उनके साथ काम करने वाली महिलावो ने रात भर जागकर सूर्य भगवान और अन्य देवी देवतावो की मुर्तिया बनाई.

इसके बदले में उन्हें पारिश्रमिक भी मिला फिर सरकारी अधिकार उन सभी मूर्तियों को अपने साथ लेकर दिल्ली चले गए लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद वे लोग फिर उस गांव में आए और उन्होंने उस गांव से दिल्ली लेकर जाने के लिए लगभग 30 स्त्रियों का चुनाव किया और उस समय मीरा देवा का बेटा 6 साल का था और मीरा देवी को महीने भर से भी ज्यादा समय के लिए दिल्ली जाना था, मीरा देवी को इस बात की चिंता थी की उनका बेटा उनके बिना इतने दिन कैसे रह पाएगा लेकिन दोस्तों मीरा देवी के पति और उनकी सास ने यह कहते हुए उनका हौसला बढ़ाया की तुम निच्छित होकर जाओ बच्चे का ध्यान हम रखेंगे ऐसे मौके बार बार नहीं मिलते.

मीरा देवी की सफलता का पहला कदम : Talent recognition

इस तरह से मीरा देवी 28 नवंबर 2012 को अपने गांव की अन्य स्त्रियों के साथ दिल्ली आगई लेकिन चार दिनों के बाद ही मीरा देवी के पिताजी का देहांत हो गया यह समाचार सुनने के बाद मीरा देवी गांव वापस जाने की जिद करने लगी ऐसे में मीरा देवी की बहन ने उन्हें फ़ोन पर समझाया की तुमने जिस काम की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ली है.

उसे बिच में अधूरा छोड़ना नहीं चाहिए, मीरा देवी के बहन के समझाने के बाद वह सबकुछ भूलकर अपने काम में जुट गई, फिर मीरा देवी को एक सवसर मिला मीरा देवी को बिहार की झाकी सुसज्जित करने का अवसर मिला मीरा देवी और उनके साथ काम करने वाली सभी महिलाओ के लिए ये एक गर्व की बात थी, मीरा देवी और साथ की सभी महिलाओ ने रोजाना देर रात काम कर उस झाकी को तैयार किया जिसमे बिहार की सस्कृति को दर्शानेवाली कई कला कृतियाँ थी.

मीरा देवी की जिंदगी सवरने लगी :

लेकिन सिककी घास से निर्मित दस – दस फुट की उचाई वाली सूर्य देवता की दो आकृतियाँ उस झाकी की मुख्य आकर्षण थी, मीरा देवी की जिंदगी सवरने लगी उनके लिए सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात यह थी की उन्हें उस झाकी में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का अवसर मिला और 26 जनवरी की सुबह मीरा देवी का पूरा गांव TV पर उन्हें देख रहा था.

गणतंत्र दिवस के बाद मीरा देवी अपने साथी महिलाओ के साथ ताजमहल देखने आगरा भी गयी, दिल्ली के प्रमुख दर्शनीय स्थलों की सैर करने के बाद मीरा देवी और उनके साथी महिलाओ को देश के राष्ट्रपति से मिलने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ. उसी के साथ मीरा देवी के परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी, इसी के साथ मीरा देवी ने यह संकल्प लिया की वे अपनी बेटी को खूब आगे तक पढ़ाएगी और उनका यह सपना भी जरूर पूरा होगा. दोस्तों मीरा देवी ने सभी महिलाओ को जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुछ कहा है वो क्या है आइए जानते है.

अपनी आंतरिक प्रतिभा को पहचानें :

दोस्तों मीरा देवी का उनके जैसी कम पड़ी लिखी महिलाओ यह कहना है की उन्हें ये सोचकर कभी निराश नहीं होना चाहिए की उच्च शिक्षा के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते, हर महिला में ऐसा कोई न कोई हुनर जरूर होता है जिसे पहचान कर वह अपने रोजगार का आधार बना सकती है चाहे फिर वो कोई भी हुनर हो जैसे की अचार – पापड़ बनाना, बीडीया बनाना, हस्त कला करना, बुनाई – कड़ाई जैसे कोई भी कला हो सकती है.

आपको बस आपकी जिस काम में रूचि है, उसमे ही काम करते रहे आजकल तो सरकार और स्वयसेवी संस्था भी महिलाओ को ऐसे कार्य करने के लिए पोसहित करती है. आप अपने इस काम की सुरवात घर से ही कर सकते है यह आप अपने मर्जी की मालिक होती है और अपने हाथो से कमाए पैसो की बात ही कुछ और होती है. ऐसा करने से महिलाओ का आत्मबल बढ़ता है और वे स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जीना सिख जाती है.

Note : नोट 

तो दोस्तों यह थी बिहार की मीरा देवी की कहानी जिस से अपने सपने को अपने हुनर के बलबूते पर सच कर के दिखाया और एक मिसाल कायम की है. दोस्तों हमें यकीन है की इस आर्टिकल को पड़ने के बाद आप भी अपने अंदर के हुनर को पहचानने कोशिश जरूर करेंगे और अपने जीवन में एक बड़ा मुकाम हासिल करेंगे.

दोस्तों अगर आपको हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आई हो तो इस आर्टिकल को अपने दोस्तों को शेयर करना न भूले और अगर आपको कोई भी परेशानी हो तो हमें कमेंट कर के जरूर बताए हम आपकी पूरी मदत करने के कोशिश करेंगे.

धन्यवाद………

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