Walking is the name of life | चलने का नाम ही जिंदगी है

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Walking is the name of life | चलने का नाम ही जिंदगी है

नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है इस साइट पर आज हम आपको Walking is the name of life इस के बारे में अपने आर्टिकल के माध्यम से अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का आसान सा तरीका बताएंगे तो चलिए जानते है.

Walking is the name of life :

दोस्तों हर किसीकी यही कोशिश होती है की वो अपनी जिंदगी को बेहतर बनाए और हमेशा अपनी जिंदगी में खुश रहे, बस हमें जरुरत है उसे पहचानने की इसके लिए सबसे पहिले अपने बारे में यह जानना जरुरी होता है की हम क्या चाहते है एक बार हमने यह जान लिया तो सारी नकारात्मकता अपने आप दूर हो जाती है और आगे बढ़ने का हमे हौसला मिलता है.

कई बार हमारे सामने ऐसे पड़ाव आते है जब हम अपने मन की नहीं कर पाते इसलिए जब भी हमें मौका मिले तो वो अधूरी ख्वाईश हमें पूरी कर लेनी चाहिए जो अक्षर हमारा पीछा करती है. जीवन के नए मायने ढूंढ़ने वाली कुछ ऐसी ही मशहूर शक्शियतो के अनुभव जानने की कोशिश कर रहे है.

समय हमेशा एकसमान नहीं रहता रास्ते में उतार चढ़ाव आते रहते है, यह हमारे अहम हिस्सा होता है. अक्सर ऐसा होता है की हम अपनी आखो में सुंदर भविष्य के सुंदर सपने संजोए अपनी मंजिल की और पुरे जोश के साथ आगे बढ़ रहे होते है, इस बिच अचानक लगने वाली ठोकर से लड़खड़ा कर हम है, ऐसे में हमारे पास दो ही रास्ते होते है एक तो हिम्मत जुटाकर उठे और दोबारा नए उत्साह के साथ आगे की और बढ़े या फिर हार मानकर वही पर बैठ जाए.

हो शकता है की पहिला विकल्प चुनने वाले को रास्ते में पहिले से कठनाईयो का सामना करना पड़ता है और उसे मनचाही सफलता नहीं मिलती, फिर भी हार मानकर रुक जाने वालो की तुलना में से उनकी जिंदगी कई गुना बेहतर होंगी क्योकि वो ठोकर ही हमें चलना सिखाती है और इसीको हम चलने का नाम जिंदगी भी कहते है.

अपना हौसला कायम रखो : Walking is the name of life

दोस्तों जीवन जीते समय या फिर या फिर कोई भी काम करते समय अपना हौसला कायम रखना चाहिए. अगर हमारा हौसला मजबूत हो तो बड़ी से भी बड़ी मुश्किल भी हमारे रास्ते में रूकावट नहीं बन सकती. मुंबई के मुकेश (परिवर्तित नाम) कहते है की मेरा बचपन बड़े गरीबी में बिता मुझे यह पता था की इस मुश्किल से बाहार निकलने के शिक्षा लेना बहुत ही जरुरी है.

इस लिए मैं पढ़ाई पर बहुत ध्यान देता था और मेरी मेहनत रंग लाई ग्रेजुएशन और एम.बी.ए. करने के बाद मुझे एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब का ऑफर आया और फिर मै इंटरव्यू देने गया और मुझे वहा जॉब मिल गई हालाकि मै पी.एच.डी. करना चाहता था पर पिरवार के पालन पोषण के लिए मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी और आगे पढ़ाई करने कसक मेरे मन में ही रह गई.

लेकिन जॉब भी करते समय मेरे मन में अपनी पढ़ाई पूरी करने का और पी.एच.डी. करने का ख्याल आता था इस लिए मैंने वह जॉब छोड़ दी। लेकिन परिवार का भी पालन पोषण करना था तो मैंने ड्राइंग क्लास खोल ली मुझे ड्राइंग करना बहुत पसंद था इस लिए परिवार की आर्थिक जरूरत पूरी करने के लिए मै नाईट में क्लास लेता था और दिन में अपनी पढ़ाई करता था.

और इसी तरह मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की इस से मुझे एक बहुत अच्छा अनुभव आया की जीवन में परिशानी और श्थितिया कितनी भी जटिल और मुश्किल क्यू न हो पर हमें खुद को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए उस परेशानी और श्थितिया का सामना डट के करना चाहिए.

सपनो के साथ चलना सीखे : Walking is the name of life

दोस्तों सभी लोग अपने – अपने भविष्य को लेकर कुछ सुनहरे ख्वाब बुनते है लेकिन कभी – कभी जीवन में अचानक कुछ ऐसा हो जाता है की जिसमे सारे सपने टूटकर बिखर जाते है. कहते है की सुबह का सपना सच होता है लेकिन क्या ये सच है. दिल्ली के इंजिनियर स्टूडेंट आकाश कहते है की मै सॉफ्टवेयर इंजिनियर बनना चाहता था, और मुझे एक बड़े इंजीनियर कॉलेज में एडमिशन भी मिल गया था पर मै फ़ीस के लिए पैसे जमा नहीं कर पाया और लगभग दो साल तक मुझे घर पर बैठना पड़ा फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी, फिर मैंने एक छोटी कंपनी में जॉब करना चालू कर दिया और जॉब के साथ ही मै इंजिनियर प्रवेश परीक्षा की भी तैयारी कर रहा था.

दो साल तक कड़ी मेहनत करने के बाद मैंने कुछ पैसे जमा कर लिए और फिर से इंजिनियर प्रवेश परीक्षा में शामिल हो गया और आई.आई.टी. से इंजीनियरिंग पड़ने के का मेरा सपना भी साकार हुआ. दोस्तों हमें इस से यह शिक मिलती है की हमारे जीवन में आने वाली परेशानी से हमें लड़ना चाहिए उसे पीछा छुड़ाकर भागना नहीं चाहिए अगर हम ऐसा करते है तो हम जरूर अपने सपनो को एक मंजिल दिला सकते है.

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थोड़ा संभले फिर आगे बढ़े : Walking is the name of life

दोस्तों यह बात सच है की हमें आने वाली परेशानी से घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसका डट के सामना करना चाहिए, क्यू की इसका एक पहलु यह भी है की जीवन के शंघर्षमय दौर में अगर हम बहुत ज्यादा शारीरिक – मानसिक थकान हो तो थोड़ा ठहर कर सुस्ता लेने में कोई बुराई नहीं है, इसमें आगे के लड़ाई के लिए अपने अंदर की ऊर्जा को सुरक्षित रखा जा सकता है. लंबी दुरी की दौड़ मैराथन में शामिल होने वाले धावक भी जितने के लिए यही राजनीती अपनाते है.

दोस्तों लखनऊ की निशा (परिवर्तित नाम) ये बताती है की मेरे पति शराब पीकर अकसर मुझे मारते थे, पड़ोस में जो आंटी रहती थी उनको जब मेरी परेशानियों के बारे में जब पता चला तो उन्होंने मुझे घर में ही सिलाई का काम करने के लिए प्रोत्साहित किया, ये सिलाई का काम करने के बाद कुछ वर्षो के बाद मेरे पास पर्याप्त पैसे जमा हो गए यह काम करने से मुझे बहुत आनंद होता था.

फिर अपना काम करने की वजहसे मुझेमें थोड़ी हिम्मत आई और फिर एक दिन मैंने अपने पति का घर छोड़ दी, अब मै अपने बच्चे को अकेले पाल सकती हु. जब चार वर्षो की लंम्बी क़ानूनी लड़ाई लड़ने के बाद मुझे इस जीवन से आज़ादी मिल गई, दोस्तों इस से हमें यह शिख मिलती है की हमें दुसरो पर निर्भर नहीं रहना चाहिए अपना काम खुद कर के गुजरा करना चाहिए.

थोड़ी से ख़ुशी अपने लिए : Walking is the name of life

दोस्तों किसी भी रिस्तो के बुरी आदतों को भुलाना बहुत ही मुश्किल होता है, लेकिन अगर हम प्रयास करे तो निच्छित रूप से सरानीय है. हमारे भारतीय समाज में हमेशा से ही स्त्रीओ की इच्छाओ को त्याग करना सिखाया जाता है. यह सच होता है की हमें अपने परिवार और आसपास के लोगो के प्रति केयरिंग रवैया अपनाना चाहिए पर इसका मतलब यह नहीं होता की आप अपनी सभी इच्छाओ का गला घोट दो.

एक सरकारी बैंक में कार्यरत संध्या बताती है की मै जब 18 साल की थी तो एक सड़क दुघर्टना में मेरे माता – पीता का निधन हो गया मै मेरे चार भाई – बहनो से सबसे बड़ी थी इसलिए अचानक उनकी सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गयी थी, फिर एक दौर ऐसा आया की जब शादी के बाद मेरे भाई – बहन अपने पारिवारिक जीवन में व्यस्त हो गए ऐसे में मुझे बहुत अकेला पन महसूस होने लगा लेकिन तब मेरी उम्र 52 साल हो चुकी थी इस दौरान मेरे जीवन में एक ऐसा इंसान आया जिसने मुझे ये एहसास की अब भी कोई देर नहीं हुई है.

मै नए सिरे से अपनी जिंदगी सवारना चाहती हु ऐसे में मैंने अपने मन को मजबूत बनाया और अपने इरादों पर डटी रही मुझे लगा की मुझे अपने बारे में भी सोचना चाहिए और फिर मैंने शादी करने का फैसला की और शादी कर ली, अब मुझे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है. मेरा मानना है की हमें अपनी खुशियों के बारे में भी सोचना चाहिए अगर मन में थोड़ी सी भी आशा हो तो हर इंसान के जीवन में आने वाली कठनाईयो का हम डट कर सामना कर सकते है.

स्टीव जॉब्स की कहानी : Walking is the name of life

दोस्तों ऐसे ही एक सख्शियत के बारे में आज हम आपको बताएंगे की कैसे वो निराश लोगो के लिए एक मिसाल बन गए चलिए जानते है. दोस्तों ये जीवन एप्पल कंपनी के सीईओ स्टीव जॉब्स का जिन्होंने निराश रहने वाले लोगो के सामने एक मिलास खड़ी किए वो कैसे आइए जानते है.

दोस्तों जब स्टीव जॉब्स 17 साल के थे उन दिनों वे कॉलेज के पढ़ाई कर रहे थे पर पढ़ाई करते समय उनके मन में एक बात हमेशा आती थी के मेरे पढ़ाई में मेरे माता – पिता की सारी कमाई खर्च हो रही है इसलिए उन्हे ऐसा लगा की कॉलेज ड्राप कर के खुद काम किया जाए और उन्होंने ऐसा ही किया वो कॉलेज ड्राप कर के काम करने लगे लेकिन उनका ऐसा करना लोगो को पसंद नहीं आया और लोग उनकी आलोचना करना सुरु कर दिए पर दोस्तों वो अपने फैसले पर डटे रहे और बाद में उनका यही निर्णय सही साभित हुआ और तब वह अपने एक दोस्त के साथ जमीन पर सोकर गुजारा कर रहे थे.

अपने भरण पोषण उन्होंने सॉफ्ट डिक्स पुराणी बॉटल्स तक बेच तक बेचनी पड़ी तब पोर्टलैंड स्थित रीड कॉलेज में कैलीग्राफी की पढ़ाई के लिए के लिए पुरे दुनिया भर में मशहूर था, स्टीप कोइस कलाने बहुत प्रभावित किया उस कॉलेज के पुरे कैंपस में हाथ से बने हुए पुरे पोस्टर लगे हुए थे यह देख कर स्टिप जोक्स को ऐसा लगा क्यू न मै भी ये कला सिख लू, फिर उन्होंने शेरिक और सैन सेरिफ सीखे इसे अगल अलग शब्दों में जोड़कर बायोग्राफी तैयार की अपने इन्ही अनुभव के आधार पर स्टीप ने अपना पहिला कंप्यूटर तैयार किया था. दोस्तों अदि उन्होंने कॉलेज के पढ़ाई अधूरी छोड़कर कैलीग्राफी नहीं सीखी होती तो शायद आज हम एप्पल कंपनी के सीईओ स्टिप जॉब्स से अपरिचित होते.

कुछ पाने के लिए खोना जरुरी है

दोस्तों हमें हमेशा ऐसा लगता है की हम नौकरी के लिए बने ही नहीं है. पर दोस्तों इशिता स्वरूप कहती है की जब आई.एम.टी. से एम.बी.ए. करने के बाद कपल प्लेसमेंट के जरिए एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी पहिली जॉब मिली पर कुछ ही महीनो बाद वह मन नहीं लगने लगा तब मुझे ऐसा लगा की मई अपना कीमती समय बर्बाद कर रही हु, जह काम करने में मेरा मन न लगे ऐसी जगह काम करना मेरे उसूलो के खिलाफ है.

फिर मैंने वह नौकरी छोड़ दी और अब मुझे अपने सपनो के लिए जीना था और अपनी पहचान बनानी थी हालाकी मेरे सामने करियर को लेकर कोई स्पस्ट तस्वीर नहीं थी की क्या करना चाहिए, दरसल उन दिनों युवाओ के बिच बी.पि. ओ. की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी इसलिए मै अपनी एक सहेली के साथ मिलकर 1995 में ओरियन डायलॉग नाम से एक डोमेस्टिक बी.पि.ओ. की सुरवात की तब हमारे पास ज्यादा साधन नहीं थे बड़ी कामयाबी को हासिल करने के लिए छोटी उपलब्धियोका मोह छोड़ना ही पड़ता है.

दोस्तों इस तरह हम अपना जीवन जी सकते है और अपने जीवन में बदलाव कर सकते है. दोस्तों अगर आपको हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आई हो तो इसे अपने दोस्तों में शेयर करना ना भूले. या फिर आपको कोई भी परेशानी हो तो हमें कमेंट कर के बताए हम आपकी पूरी मदत करने की कोशिश करेंगे.

धन्यवाद……….!

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